*देश के प्रति नेहरू के अपराध-18*
*नालन्दा स्टेशन का नाम बदलना*
नालन्दा विश्वविद्यालय (बिहार) दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था, जिसकी स्थापना 5वीं शताब्दी में गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम (427 ईस्वी के आसपास) ने की थी। यह 12वीं शताब्दी तक बौद्ध शिक्षा और ज्ञान का प्रमुख केंद्र था, जिसमें 10,000 से अधिक छात्र और लगभग 2,000 शिक्षक रहते थे। 1193 में बख्तियार खिलजी ने इसे आग लगाकर नष्ट कर दिया था और उसमें रहनेवाले सभी शिक्षकों तथा विद्यार्थियों को मौत के घाट उतार दिया था। उस समय इस विश्वविद्यालय में इतनी पुस्तकें थीं कि वे 6 माह तक जलती रहीं। लाखों पुस्तकों के रूप में प्राचीन ज्ञान-विज्ञान का वह खजाना सदा के लिए नष्ट हो गया, जिसकी पूर्ति आज तक नहीं हो पायी है।
वर्तमान में इस विश्वविद्यालय के चिह्न केवल खंडहर के रूप में पाये जाते हैं, जिनको देखकर इस महान् ज्ञान केन्द्र की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन ‘भारत की खोज’ करने वाले नेहरू को हमारी प्राचीन विरासत से इतनी घृणा थी कि उन्होंने इस महान् विश्वविद्यालय को पुनः बनाने का कोई प्रयास तो किया ही नहीं, उसके निकट बने
‘नालन्दा’ नाम के रेलवे स्टेशन का नाम भी बदलकर उसे नष्ट करनेवाले इस्लामी आततायी बख्तियार खिलजी के नाम पर ‘बख्तियारपुर’ रख दिया, जो आज भी उसी नाम से बना हुआ है।
इस बात के प्रबल प्रमाण उपलब्ध हैं कि 1953 और उससे पूर्व इस रेलवे स्टेशन का नाम ‘नालन्दा’ ही था, जिसे बाद में बदलकर ‘बख्तियारपुर’ किया गया था। भारत सरकार की फिल्म्स डिवीज़न ऑफ़ इंडिया द्वारा 1953 में बिहार और नालन्दा विश्वद्यालय पर एक छोटी-सी डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनायी गयी थी। उस फिल्म में स्पष्ट दिखाया गया है कि उस समय इस स्टेशन का नाम ‘नालन्दा’ था (देखिए संलग्न चित्र)। आज इस नाम का कोई रेलवे स्टेशन नहीं है, बल्कि उसके स्थान पर ‘बख्तियारपुर’ स्टेशन मिलता है।
वह लघु फिल्म इंटरनेट पर ‘यूट्यूब’ पर उपलब्ध है। यहाँ उस डॉक्यूमेंटरी फिल्म का लिंक दिया जा रहा है, जिसे खोलकर कोई भी इस बात की पुष्टि कर सकता है-
इस बात का उत्तर कोई कांग्रेसी नहीं देगा कि नेहरू और कांग्रेस को भारत के प्राचीन गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान से इतनी घृणा क्यों थी कि नालन्दा नाम के स्टेशन तक का नाम बदलकर आततायी बख्तियार खिलजी के नाम पर रख दिया गया?
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